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पैडमैन देखने से पहले इसे जरूर पढ़ लें

जब सामाजिक विषयों या फिर देश की रक्षा से जुड़े विषयों या फिर पारिवारिक जिम्मेदारियों पर भी आधारित फिल्मों में अभिनय की बात आती है, तो इन सभी प्रकार की कैटेगरी की फिल्मों से हम अक्षय कुमार का नाम जुड़ा पाते हैं। अक्षय की लेटेस्ट फिल्म ‘पैडमैन’ भी महिलाओं से जुड़े एक महत्वपूर्ण विषय माहवारी और सैनिटरी पैड पर आधारित है, जिसमें उन्होंने एक बड़ा संदेश दिया है।

आर बाल्की, जो इस फिल्म के निर्देशक हैं, वे हमेशा से ही लीक से हटकर फिल्में बनाने के लिए जाने जाते हैं। वे चीनी कम, पा और की एंड का जैसी फिल्मों में अपने निर्देशन का जौहर दिखा चुके हैं। उनकी इन सभी फिल्मों को बड़ा सम्मान और सराहना मिली है। फिल्म पैडमैन में भी उन्होंने अपनी तरफ से कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी है और इसे इसके विषय के इर्द-गिर्द ही घूमते हुए बनाया है। यह फिल्म अरुणाचलम मुरुगनथम की जिंदगी पर आधारित है, जिन्होंने हाइजेनिक और सस्ते सैनिटरी पैड महिलाओं को मुहैया कराने के लिए इसकी मशीन का ही आविष्कार कर डाला।

कहानी. बतौर मुख्य अभिनेता इस फिल्म में अक्षय कुमार ने लक्ष्मीकांत चैहान की भूमिका निभाई है। उनकी पत्नी के किरदार में राधिक आप्टे हैं, जिनका नाम गायत्री है। उससे शादी करने के बाद लक्ष्मीकांत को पता चलता है कि माहवारी के दौरान न केवल उसे गंदे कपड़े का इस्तेमाल करना पड़ता है, बल्कि पांच दिनों तक उसे अछूत बताकर घर से बाहर भी रखा जाता है। ऐसे में जब उसे डाॅक्टर से यह पता चलता है कि इन गंदे कपड़ों, राख और छाल आदि के इस्तेमाल की वजह से ये महिलाएं भयानक बीमारियों को खुद पर हमला करने के लिए दावत देती हैं, तो वह खुद सैनिटरी पैड बनाने का प्रयास शुरू कर देता है।

उसके इस इरादे की वजह से उसे न केवल अपनी पत्नी, बहन और मां की ओर से अपमान झेलना पड़ता है, बल्कि उसे गांव का समाज भी जलील करके उसका बहिष्कार कर देता है। जितना ज्यादा वह अपमानित होता है, उतना ही उसका इरादा और मजबूत होता जाता है। इस बीच उसकी मुलाकात दिल्ली में एक एमबीए की स्टूडेंट परी यानी कि सोनम कपूर से हो जाती है, जो उसके इरादों को हकीकत में बदलने में उसका साथ देती है।

निर्देशन. इसमें कोई शक नहीं कि आर बाल्की ने एक ऐसे मुद्दे यानी कि मासिक धर्म और सैनिटरी पैड को उठाया है, जिस पर अब तक समाज बात करने से कतराता रहा है। इसलिए यह फिल्म इस वक्त के अनुसार बिल्कुल सही बैठती है, लेकिन फिर भी फिल्म को देखने के दौरान आपको यह एहसास होगा कि कई जगहों पर बाल्की ने फिल्म के जरिये उपदेश देना शुरू कर दिया है, जो थोड़ा बोझिल होने लगता है। फिर भी उन्होंने चुटीले डायलाॅग्स और हल्के-फुल्के हंसाने वाले दृश्यों से इसका संतुलन बना दिया है। एक चीज अच्छी है कि बाल्की ने इसके लिए दक्षिण का लोकेशन नहीं चुना। मध्य प्रदेश को बैकग्राउंड में रखने से फिल्म की कहानी बेहद रोचक बन पड़ी है।

अभिनय. अक्षय की खास बात यह है कि वे अपने किरदार में पूरी तरह से रम जाते हैं। बीते कुछ समय में टाॅयलेट एक प्रेम कथा और जाॅली एलएलबी में भी हम उनके लाजवाब अभिनय को देख चुके हैं। यहां भी उन्होंने पैडमैन के किरदार में जान डाल दी है। उन्होंने समाज से तिरस्कृत होने के बावजूद जो सैनिटरी पैड बनाने के प्रति दीवानगी का प्रदर्शन फिल्म में किया है और अपने किरदार को जिस तरह से पेश किया है, वह किसी भी कलाकार के लिए मामूली बात नहीं है। राधिका आप्टे ने भी अपने किरदार के साथ न्याय किया है और वे बेहद सहज नजर आई हैं। जहां तक सोनम कपूर की बात है, तो उनके भी फिल्म में होने की वजह से यह खूबसूरत बन पड़ी है और उनकी मौजूदगी फिल्म में एक सुखद एहसास भी कराती है।

खास बातें. एक बात यह भी है कि फिल्म में हर कलाकार ने अपना काम पूरी मजबूती और तन्मयता से किया है। सभी कलाकारों का अभिनय प्रभावशाली रहा है। विशेषकर बिग बी यानी कि अमिताभ बच्चन की एंट्री भी बड़ा प्रभावित करने वाली है। इसके अलावा यदि संगीत की बात करें, तो इसके गाने पैडमैन पैडमैन, हूबहू, आज से मेरा हो गया भी बड़े खूबसूरत बन पड़े हैं। अमित त्रिवेदी ने कमाल का संगीत दिया है। पीसी श्रीराम की सिनेमेटोग्राफी बेहतरीन है। अंतिम 10 मिनट आपको एकदम बांध देंगे। अक्षय कुमार का इस दौरान यूएन में दिया गया भाषण आपमें कुछ कर गुजरने का जज्बा पैदा कर देगा।

इसलिए देखें. अक्षय कुमार के शानदार अभिनय को देखने के लिए तो यह फिल्म देखी ही जा सकती है, लेकिन उसके अलावा जो संदेश यह फिल्म दे रही है, उसके लिए भी इसे देखना जरूरी बन जाता है। सोनम कपूर एक डायलाॅग बोलती हैं, ‘तुम गांव हो, मैं शहर! इन्हें तो आज तक डिजिटल इंडिया भी नहीं जोड़ पाया।’ यह दृश्य बस एक पल के लिए आता है, मगर इसमें देश की एक बड़ी सच्चाई छिपी हुई है। इस तरह के ढेरों दृश्य देखने के लिए आप यह फिल्म देख सकते हैं।