मुल्क को हम और वो में बांटने वालों की पोल खोलती है ‘मुल्क’
आतंकवाद के मुद्दे पर तो दोस्तों कई फिल्में बन चुकी हैं, लेकिन अनुभव सिन्हा के निर्देशन में बनी और शुक्रवार को रिलीज हुई फिल्म ‘मुल्क’ की बात ही इस मामले में कुछ और है। पूरी तरह से अपने विषय पर केंद्रित यह फिल्म न केवल आतंकवाद शब्द का विश्लेषण करती है, बल्कि इसकी आड़ में अपना उल्लू सीधा करने वाले लोगों पर भी तीखा प्रहार करती है। विशेषकर ऋषि कपूर का अभिनय इस फिल्म की जान है।

ऋषि कपूर के चेहरे पर उभरने वाले हावभाव सचमुच देखने लायक हैं। तापसी पन्नू ने तो पहले ही कहा था कि उन्होंने पिंक में अमिताभ बच्चन के किरदार से काफी प्रेरणा ली है। यह बात इस फिल्म में उनके अभिनय में नजर आयी है। मनोज पाहवा ने भी अपनी भूमिका से दिल जीत लिया है। रजत कपूर ने एक बार फिर से साबित किया है कि अभिनय उनके रग-रग में बसा है। बाकी कलाकारों आशुतोष राणा, प्रतीक स्मित बब्बर, नीना गुप्ता, प्राची शाह और कुमुद मिश्रा ने भी अपनी भूमिका के साथ न्याय किया है।

फिल्म की कहानी वाराणसी के एक मुस्लिम परिवार के बारे में है, जिसका उठना-बैठना मिश्रा और चैबे परिवारों के साथ है। सभी लोग मिल-जुल कर रहते हैं, लेकिन अचानक एक दिन मुराद अली मोहम्मद (ऋषि कपूर) के भतीजे के एक आतंकवादी हमले में शामिल होने की खबर से इस परिवार की खुशियां एकदम से छिन जाती हैं। इस हमले में 16 निर्दोष अपनी जान गंवा बैठते हैं। उनके भतीजे को पुलिस मार गिराती है। इसके बाद पूरा परिवार जांच के घेरे में आ जाता है।

खासियत इस फिल्म की यह है कि इसमें बनारस, इसकी गलियों, यहां के लोगों की बातचीत के तरीकों और हिंदू-मुस्लिम एकता को ठीक उसी रूप में दिखाया गया है, जैसा कि ये असल में नजर आते हैं। मजहब का जिक्र फिल्म में भले ही जगह-जगह पर हुआ है, लेकिन इससे कहीं पर भी किसी की धार्मिक भावना को ठेस नहीं पहुंचाया गया है। मुल्क क्या है और इसका मजहब से क्या रिश्ता है, इस चीज को आतंकवाद के जरिये फिल्म में दिखाने की कोशिश की गयी है।

कोर्ट में चल रही बहस का अधिकतर हिस्सा इसी बात पर टिका नजर आता है कि लोगों की मानसिकता ने किस तरह से सदियों से चली आ रही हिंदू-मुस्लिम एकता को कभी-कभी विखंडित करने का प्रयास किया है। इसमें कोई शक नहीं कि यह फिल्म आतंकवाद की असल परिभाषा से अपने दर्शकों का परिचय करवाती है और आतंकवाद को लेकर फैली आम राय और गलतफहमियों पर भी अपने दर्शकों से पुनर्विचार करने की अपील करती है।

तापसी पन्नू ने हाल के दिनों में अपने अभिनय पर कुछ ज्यादी ही मेहनत की है। इस फिल्म में इसका परिणाम देखने को मिला है। अनुभव क्या होता है, यह कोई इस फिल्म में ऋषि कपूर के अभिनय से सीखे। केस का फैसला सुनाते वक्त फिल्म में न्यायाधीश ने जो बातें कही हैं, उसके जरिये असल में समाज को आईना दिखाने का प्रयास किया गया है। सोशल मीडिया का प्रभाव, युवा पीढ़ी का भटकाव और बच्चों को लेकर पैरेंट्स के बीच जागरुकता की कमी जैसे विषयों को भी फिल्म ने दर्शकों के सामने लाकर रखा है।

फिल्म में न तो कहीं किसी अपशब्द का इस्तेमाल किया गया है और न ही कोई आपत्तिजनक दृश्य है। पूरी तरह से साफ-सुथरी यह फिल्म परिवार के साथ बैठकर देखी जा सकती है। इसका संगीत बेजोड़ तो नहीं, मगर निराश करने वाला भी नहीं है। फिल्म मुल्क को ‘हम और वो’ में नहीं बांटने का संदेश देते हुए समाप्त होती है।

