अब स्वामी अग्निवेश भी पड़े ‘पद्मावत’ के पीछे, इस शिकायत के साथ जाएंगे सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली। 24 फरवरी। पद्मावत फिल्म की रिलीज़ से पहले करणी सेना ने ख़ूब तांडव किया, लेकिन जब फिल्म एक बार रिलीज़ हो गई और तगड़ा कारोबार करने के बाद इसे बॉक्स ऑफिस पर सुपर-डुपर हिट करार दे दिया गया है, तब भी इसे लेकर विवाद थमता नज़र नहीं आ रहा है।

अब मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश ने इस फिल्म के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में जाने की बात कही है। हालांकि वे इस फिल्म का विरोध उन कारणों से नहीं कर रहे हैं, जिन कारणों से करणी सेना कर रही थी। स्वामी अग्निवेश का आरोप है कि इस फिल्म में सती-जौहर का जिस तरीके से महिमामंडन किया गया है, वह “भारत के संवैधानिक मूल्यों तथा Sati Prevention Act 1987 की धज्जी उड़ाना है।”

स्वामी अग्निवेश ने फिलिमची.कॉम को भेजे अपने प्रेस नोट में सिलसिलेवार तरीके से बताया है कि किस तरह से उनकी बात को थाने से लेकर दिल्ली हाई कोर्ट तक अनसुनी कर दी गई और इसलिए अब वे उच्चतम न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाने के लिए मजबूर हो गए हैं। स्वामी अग्निवेश का यह प्रेस नोट हम फिलिमची.कॉम के पाठकों के लिए ज्यों का त्यों रख रहे हैं।

प्रेस नोट
1. पद्मावती फिल्म के 25 जनवरी 2018 को रिलीज से पहले जो हिंसात्मक उत्पात (राजपूत करणी सेना आदि ने और BJP राज्य सरकारों ने अड़ियल रूख रखा) था उसका मैंने पुरूजोर विरोध किया – खासकर इसलिए कि यह सब फिल्म बिना देखे किया जा रहा था।
2. फिल्म सर्टीफिकेशन बोर्ड द्वारा पद्मावत को स्वीकृति के बाद और सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनुमोदित होने के बाद हमने मान लिया किया उसमें कुछ भी गैरकानूनी और गलत बात नहीं हैं।
3. इंडियन एक्सप्रेस में प्रो0 चारू गुप्ता का तथा दि वायर में अभिनेत्री स्वरा भास्कर की तीखी आलोचना और सती-जौहर के महिमामंडन की बाते पढ़कर आश्चर्य हुआ और तब मैंने 3 फरवरी को स्वयं PVR Plaza में जाकर फिल्म देखकर इन आरोपों को सही पाया।
4. 3 फरवरी को ही शाम 4 बजे मैंने संसद मार्ग थाने में FIR के लिए प्रयास किया जिसे Complaint के रूप में लेकर 4 दिन बाद कनाॅट प्लेस थाना भेज दिया गया और FIR दर्ज नहीं किया गया।
5. मज़बूर होकर हमने दिल्ली हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की-इस मांग के साथ कि इस फिल्म के प्रदर्शन से Sati Prevention Act 1987 का जबरदस्त उल्लंघन हुआ है और इसलिए सभी जिम्मेदार लोगों के विरूद्ध कार्यवाही हो और आगे प्रदर्शन में आपत्तिजनक बातों को काटकर दिखाया जाय।
6. 19 फरवरी को याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई कर माननीय उच्च न्यायालय ने 22 फरवरी, 2018 को अपने फैसले में इस याचिका को निरस्त ¼dismiss½ कर दिया।
7. निरस्त करने के जो कारण बताये गये हैं वे हास्यास्पद और कानून की अवहेलना करने वाले हैं। ऐसा करके दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपनी निष्पक्ष न्यायिक गरिमा को ठेस पहुँचाई है। इस याचिका को स्वीकार कर इस पर हमें बहस का मौका मिलना चाहिये था। पूरी तरह सुने बगैर इस तरह एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका को रद्द करना और वह भी नारी उत्पीड़न के बीभत्स सती प्रथा के बेशर्म महिमामंडन के फिल्मांकन को परोक्ष रूप से बढ़ावा देना भारत के संवैधानिक मूल्यों तथा Sati Prevention Act 1987 की धज्जी उड़ाना है।
दिल्ली उच्च न्यायालय के मान्य मुख्य न्यायमूर्ति गीता मित्तल एवं न्यायाधीश सी. हरिशंकर के इस एक तरफा फैसले से आहत होकर हम शीघ्र ही सर्वोच्च न्यायालय में इसकी अपील करेंगे और इस पूरे प्रकरण को आम जनता में बहस के लिए तथा 1987 के कानून के प्रति जागरूकता पैदा करने का प्रयास करेंगे। मान्य न्यायाधीशों की अपनी चेतना जब कुंद हो जाय तो जनजागरण से ही उसे जगाया जा सकता है। वरना समाज में नारी उत्पीड़न की परम्परायें इसी तरह दनदनाती रहेंगी।
– स्वामी अग्निवेश

डिस्क्लेमर: उपरोक्त प्रेस नोट में व्यक्त किए गए विचार पूरी तरह से स्वामी अग्निवेश के निजी विचार हैं । यदि अन्य पक्ष भी मर्यादा और कानून के दायरे में इस मुद्दे पर अपने विचार रखना चाहें, तो फिलिमची.कॉम उसे ज्यों का त्यों प्रकाशित करने के लिए प्रतिबद्ध है।
